दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा समलैंगिकता को वैध करार देने के बाद क्या इसे सामाजिक मान्यता मिल पाएगी?
04-07-09 (10:53 PM)
Mahavir Saran Jain
समाज में जब भी कोई परिवर्तन होता है तो पहले विपरीत प्रतिक्रिया होती है बाद में समाज उसे स्वीकार कर लेता है. जब सती प्रथा के खिलाफ में क़ानून बना था तो समाज के परंपरागत मूल्यों में विश्वास करने वालों ने इसका विरोध किया था. जब बंगाल में राजा राम मोहन राय ने सामाजिक सुधार की मुहिम ाचलाई थी तो उनकों समाज के परंपरागत मूल्यों में विश्वास कराने वालों के विरोध का सामना करना पड़ा था. जब हमारे समाज में एक वर्ग समलिंगी है तो धीरे धीरे पूरे समाज को उनके चयन के अधिकार को मान्यता देनी होगी. पूरा समाज समलिंगी न तो है और न होगा. मगर दो वयस्क किस प्रकार से अपने प्यार को अंजाम देना चाहते है यह उनके चयन का मामला है. कहावत है - जब मियान बीबी राजी तो क्या करेगा काज़ी
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03-07-09 (08:07 PM)
vivek ranjan shrivastava
न्यायालय का सम्मान उचित है यह सभ्य समाज की निशानी भी है , पर न्यायाधीशो की व्यक्तिगत दृष्टि से न्याय प्रभावित नही होना चाहिये . यदि ऐसा होगा तो उसे सामाजिक मान्यता नही मिल पायेगी
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03-07-09 (06:29 PM)
nicky
सामाजिक मान्यता मिल भी जायेगी तो क्या खुले आम अप्नी बाल्कोनी मै या छत पर करते नजर आयेंगे ये समलैंगिक लोग.कुछ नही होगा जो अब तक़ होता आरहा है वही और वैसे ही होगा
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02-07-09 (10:27 PM)
ajay kumar gupta
नहीं ऐसा होना भी नहीं चहिये
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02-07-09 (08:22 PM)
sureshchandra k
ऐसे घिनोने तथा अप्राकृतिक संबंधों को समाज कभी भी मान्यता नहीं देगा. शाहबानों प्रकरण में क्या हुआ था? इसी तर्ज पर संसद फैसले के स्थान पर संविधान में संशोधन कर सकती है.
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